रिश्ता टूटने के बाद सहमति से बने संबंध रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

HIGHLIGHTS
- सुप्रीम कोर्ट ने असफल रिश्तों से जुड़े आपराधिक मामलों पर जताई चिंता।
- केरल के संतोष कुमार एन.पी. को बलात्कार और धोखाधड़ी के आरोपों से किया मुक्त।
- अदालत ने यौन सहमति की कानूनी वैधता में अंतर स्पष्ट किया।
नई दिल्ली। रिश्तों में अलगाव के बाद आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपसी सहमति और स्नेह के आधार पर बने रिश्ते में वयस्कों के बीच हुए शारीरिक संबंधों को सिर्फ इस वजह से बलात्कार का अपराध नहीं माना जा सकता कि बाद में उनका रिश्ता टूट गया।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केरल के एक व्यक्ति को बलात्कार और धोखाधड़ी के आरोपों से मुक्त करते हुए कहा कि उन मामलों में अंतर करना जरूरी है, जहां शुरुआत से ही यौन संबंध बनाने की सहमति कानूनी रूप से अमान्य होती है और उन मामलों में, जहां रिश्ता समाप्त होने के बाद कोई व्यक्ति पहले अपनी सहमति से बने शारीरिक संबंधों पर सवाल उठाने लगता है।
रिश्ते में आई खटास को बलात्कार नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी रिश्ते के दौरान बनी शारीरिक नजदीकियों को बाद में केवल इसलिए बलात्कार का रूप नहीं दिया जा सकता, क्योंकि दोनों के बीच संबंध खराब हो गए और रिश्ता खत्म हो गया।
अदालत ने कहा कि बाद में इस तरह की सोच रखना दुर्भाग्यपूर्ण है। आपसी सहमति से बने रिश्ते को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। साथ ही, इसके आधार पर आपराधिक न्याय व्यवस्था का इस्तेमाल इस तरह नहीं होना चाहिए कि किसी व्यक्ति की आजादी और प्रतिष्ठा प्रभावित हो।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा नजरिया पुरुष की अपनी इच्छा से फैसला लेने की स्वतंत्रता को समाप्त कर देता है। यदि कोई पुरुष किसी समय आपसी सहमति से रिश्ते में रहा है, तो क्या बाद में बलात्कार के आरोप का डर उसे हमेशा उसी रिश्ते में बने रहने के लिए मजबूर कर सकता है?
पीठ ने सवाल उठाया कि क्या किसी पुरुष को रिश्ता खत्म करने का अधिकार नहीं है और क्या ऐसा करने को धोखा या धोखाधड़ी कहा जा सकता है? अदालत ने इसका जवाब स्पष्ट रूप से नकारात्मक दिया।
असफल रिश्तों को आपराधिक मामलों में बदलने पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसे मामले बार-बार आ रहे हैं, जिनमें टूट चुके रिश्तों को आपराधिक मुकदमों का रूप दे दिया जाता है। पीठ ने चेताया कि बलात्कार का आरोप बेहद गंभीर अपराध है। इसका इस्तेमाल केवल उन्हीं परिस्थितियों में होना चाहिए, जहां वास्तव में यौन हिंसा, जबरदस्ती या सहमति प्राप्त करने के लिए धोखाधड़ी की गई हो।
अदालत ने कहा कि जब आपसी सहमति से बने रिश्ते में आई कड़वाहट को बाद में बलात्कार के आरोप में बदल दिया जाता है, तो इससे इस गंभीर अपराध के आरोप का महत्व और गंभीरता प्रभावित होती है।
क्या है पूरा मामला?
इस मामले में आरोपी संतोष कुमार एन.पी. ने केरल हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने उनकी डिस्चार्ज याचिका यानी आरोपों से मुक्त करने की मांग और उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी थी।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाकर उससे दूसरी शादी की। पीड़िता का कहना था कि आरोपी ने धोखाधड़ी से गैर-कानूनी शादी की और इसी आधार पर उसकी सहमति लेकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
महिला का आरोप था कि आरोपी ने उसे यह भरोसा दिलाया कि उनकी शादी कानूनी रूप से वैध है। इसके बाद दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे। हालांकि, आरोपी की पहली शादी उस समय भी कायम थी।
पहले से तलाकशुदा महिला ने आरोपी के खिलाफ बलात्कार, धोखाधड़ी और विश्वासघात के आरोप लगाए थे। शिकायत के अनुसार, दोनों ने मैसूर में शादी की थी और वर्ष 1996 से 2003 तक साथ रहे।
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