तमिलनाडु में हिंदी थोपने का विरोध जारी: उपमुख्यमंत्री ने याद दिलाया 1937 का आंदोलन

तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने हिंदी भाषा को लेकर अपना सख्त रुख फिर से दोहराया है। उन्होंने कहा कि राज्य में हिंदी थोपने का विरोध कोई नया मुद्दा नहीं है, बल्कि यह दशकों पुराने आंदोलनों और इतिहास से जुड़ा हुआ है।
1937 के आंदोलन से लेकर आज तक
उदयनिधि स्टालिन ने याद दिलाया कि पहला बड़ा हिंदी विरोध आंदोलन 1937-38 में समाज सुधारक पेरियार ने शुरू किया था, जब स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने का निर्णय लिया गया था। उन्होंने बताया कि उस समय पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि (कलाईनार) भी 14 साल की उम्र में तिरुवरूर में आयोजित प्रदर्शनों में शामिल हुए थे। इसके बाद 21 फरवरी 1940 को सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा और स्कूलों में हिंदी की अनिवार्यता खत्म कर दी गई।
तमिल को किसी सहारे की जरूरत नहीं
उपमुख्यमंत्री ने कहा कि तमिल भाषा इतनी मजबूत और समृद्ध है कि उसे किसी अन्य भाषा पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं। कई लोग सवाल उठाते हैं कि जब देश के अन्य राज्यों ने हिंदी को स्वीकार कर लिया है, तो तमिलनाडु इसका विरोध क्यों करता है। स्टालिन ने स्पष्ट किया कि डीएमके ने हमेशा दो-भाषा नीति को कायम रखा है और राज्य में हिंदी के लिए कोई जगह नहीं होगी।
डीएमके और तमिल की पहचान
उदयनिधि स्टालिन ने डीएमके की उपलब्धियों पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, डीएमके ही वह पार्टी है जिसने राज्य का नाम तमिलनाडु रखा और तमिल भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
स्टालिन के इस बयान को तमिलनाडु में भाषा राजनीति और केंद्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य में लंबे समय से हिंदी विरोध और क्षेत्रीय पहचान संवेदनशील मुद्दा रहे हैं, और उनके बयान ने इसे फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
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