ममता कालिया को ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार

गाजियाबाद। 70 साल पहले एक दीवाली विशेषांक के साथ कहानी लेखन की शुरुआत करने वाली साहित्यकार ममता कालिया अब साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चयनित हो गई हैं। उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ ने इस प्रतिष्ठित पुरस्कार की दौड़ में जगह बनाई है।
साहित्य अकादमी की सोमवार को हुई घोषणा के बाद उनके निवास और फोन पर बड़ी संख्या में शुभकामनाएं पहुंची। 31 मार्च को उन्हें पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।
साहित्य की लंबी यात्रा
दो नवम्बर 1940 को वृंदावन में जन्मी ममता कालिया ने मात्र 15 साल की उम्र में लेखन शुरू किया। उनके अनुसार, उस समय उन्हें कहानी लिखने के लिए 10 रुपये पारिश्रमिक मिला था, जो उस समय बड़ी रकम थी। साहित्य के प्रति उनकी लगन ने उन्हें आज तक सक्रिय रखा।
संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ 2021 में प्रकाशित हुआ और केवल 28 दिन में इसका दूसरा संस्करण आया। अब तक इसके चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। यह किताब सिर्फ शहर का वर्णन नहीं करती, बल्कि स्मृतियों, लोगों और सांस्कृतिक अनुभवों के जरिए एक पूरे दौर को जीवंत करती है।
ममता कालिया अपने व्यक्तिगत अनुभवों और मुलाकातों के सहारे उस इलाहाबाद को पाठकों के सामने लाती हैं, जहां विश्वविद्यालय, साहित्यिक गोष्ठियां, लेखक-मित्रताएं और कॉफी-हाउस का विशेष वातावरण था। उनका मानना है कि संस्मरण के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार के चयन से अन्य लेखकों को भी प्रेरणा मिलेगी।
प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
‘जीते जी इलाहाबाद’ के अलावा ममता कालिया को कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं, जिनमें व्यास सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, यशपाल स्मृति सम्मान, महादेवी स्मृति पुरस्कार, राममनोहर लोहिया सम्मान, कमलेश्वर स्मृति सम्मान, सावित्रीबाई फुले स्मृति सम्मान और लमही सम्मान शामिल हैं।
साहित्य में योगदान
ममता कालिया महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की त्रैमासिक अंग्रेजी पत्रिका ‘हिंदी’ की संपादक रह चुकी हैं। उनके उपन्यासों में ‘बेघर’, ‘नरक-दर-नरक’, ‘दौड़’, ‘दुख़म सुख़म’, ‘सपनों की होम डिलिवरी’, ‘कल्चर-वल्चर’ और ‘सच्चा झूठ’ प्रकाशित हैं।
कहानी-संग्रहों में ‘छुटकारा’, ‘उसका यौवन’, ‘मुखौटा’, ‘जांच अभी जारी है’, ‘सीट नंबर छह’, ‘निर्मोही’, ‘प्रतिदिन’, ‘थोड़ा-सा प्रगतिशील’, ‘एक अदद औरत’, ‘बोलने वाली औरत’, ‘पच्चीस साल की लड़की’, ‘खुशकिस्मत’ और ‘प्रतिनिधि कहानियां’ शामिल हैं।
कविता-संग्रहों में ‘ए ट्रिब्यूट टू पापा’, ‘पोयम ’78’, ‘खांटी घरेलू औरत’, ‘कितने प्रश्न करूं’, ‘पचास कविताएं’, ‘एकांकी-संग्रह आप न बदलेंगे’ प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा संस्मरणों और स्त्री-विमर्श पर कई अन्य कृतियां भी उनकी रचनात्मक उपलब्धियों में शामिल हैं।
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